Monday, May 26, 2008

'चे गुवेरा' से पहली मुलाकात(दिल्ली डायरी 1)


दिल्ली नया-नया पहूंचा था और अपने संघर्ष की भूमी तैयार करने की जुगत में लगा हुआ था.. उन दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अपना पूरा समय कटता था.. दिन का खाना सतलज छात्रावास में गेस्ट के तौर पर खाता था और अगर कोई पूछ बैठे कि किसके गेस्ट हैं तो 2-4 लड़कों से मैंने दोस्ती कर रखी थी जो मेरी जिम्मेदारी ले सके.. दोपहर का खाना लाईब्रेरी के कैंटीन में खाता और रात का खाना या तो गंगा ढाबा में या फिर टेफ्ला में..

एक दिन, ना जाने किस बात के लिये, मैंने देखा कि टेफ्ला के बाहर कोई स्टॉल लगा हुआ है.. स्टॉल लगाने वाले शायद AISA के समर्थक थे.. उस स्टॉल में जितने भी टी-शर्ट रखे हुये थे उन सभी पर 'चे' कि तस्वीर लगी हुई थी.. उस समय तक मुझे 'चे' के बारे में कुछ भी पता नहीं था.. मैंने सोचा कि शायद ये बहुत फंकी सा लग रहा है जो युवाओं में बहुत पसंद किया जाता है सो ज्यादा सामान बेचने के लिये इसे बेच रहे हैं.. मैं बस खाना खाया और उसे नजर अंदाज करके वहां से निकल गया.. मगर 'चे' से मेरी पहली मुलाकात हो चुकी थी.. भले ही मैं उनका नाम भी नहीं जानता था उस समय..

धीरे-धीरे मैंने पाया की ये चेहरा जे.एन.यू. में बहुत ही जाना पहचाना है सो मुझे ये अनुमान हो चुका था कि ये जरूर कोई बहुत बड़ी हस्ती होगी.. मगर मेरा दुर्भाग्य ऐसा की मैंने जहां कहीं भी उनकी तस्वीर देखी थी वहां उनका नाम नहीं लिखा हुआ था.. कुछ संकोच होने के कारण मैंने किसी से पूछा भी नहीं कि ये किन महाशय की तस्वीर है..

एक दिन सरोजिनी नगर मार्केट घूम रहा था.. वहां भी उसी तस्वीर वाली एक टी-शर्ट दिख गई.. मगर उस टी-शर्ट पर उनका नाम लिखा हुआ था.. 'चे'.. और कुछ नहीं.. शाम में जब अपने कमरे में पहूंचा तो मैंने साइबर कैफे जाकर 'चे' को सर्च किया.. वो जमाना गूगल का नहीं आया था.. अधिकतर सर्च याहू पर ही होते थे.. 'चे' नाम के पन्ने खुलते गये और जितना मैं उनके बारे में जानता गया उतना ही प्रभावित होता गया..

उनके बारे में कुछ और अच्छी बाते तब पढ़ने को मिली जब ओम थानवी जी अपने कुछ संस्मरण मोहल्ला पर हम लोगों से बांटे.. अगर कभी आपको मौका मिले तो वे लेख पढ़ना ना भूलें.. वो आपको यहां, यहां, यहां और यहां मिलेंगे..

उनकी तारीफ करना मेरे वश में नहीं है, अगर मैं उनकी तारीफ करूंगा तो ये कुछ वैसा ही होगा जैसे सूरज को रोशनी दिखाना.. आज जब विकी का जमाना आ गया है तो कोई भी बस विकी पर जाकर एक ही जगह उनके बारे में सारी जानकारी मिल सकती है.. ज्यादा जानने के लिये यहां चटका दबाऐं..

Sunday, May 25, 2008

अमवा के पेड़वा पर झुलुआ झुलैया के याद आवेला

अमवा के पेड़वा पर झुलुआ झुलैया के याद आवेला,
गरमी के दिनवा में नानी के गऊँआ के याद आवेला।।

धूल भरल ट्रेफिक में गऊँआ के टमटम के याद आवेला,
आफिस के खिचखिच में मस्ती भरल दिनवा के याद आवेला।
दोस्तन के झूठिया देख माई से झूठिया बोलल याद आवेला,
प्रदूषण भरल पनिया देख तलवा तलैया के याद आवेला।।
गरमी के दिनवा में.......।।

ब्रेड बटर के देखत ही मकुनी अऊर चोखा के याद आवेला,
कोल्ड ड्रिंक के केलोरी में छाछ और पन्ना के याद आवेला।
फास्ट फूडन के दुनिया में सतुआ-चबेना के याद आवेला,
अश्लील भईल सिनेमा से कठपुतली के नचवा के याद आवेला।।
गरमी के दिनवा में.......।।

बीबी के होटल बाजी से माई के खनवा के याद आवेला,
मतलबी पटीदारन में जानवर के वफादारी के ञाद आवेला।
दारुबाजन के हुड़दंगई में भंगिया के मस्ती के याद आवेला,
पुलिसियन के रौब देख रावण अहिरावण के याद आवेला।।
गरमी के दिनवा में.......।।

भ्रष्टाचारी के मनसा देख सुरसा के मुँहवा के याद आवेला,
नेताजी के करनी से गिरगिटया के रंग बदलल याद आवेला।
बेईमान भरल दुनिया में आपन बेईमानी के याद आवेला,
ना होए पुनर्जन्म अब तऽ बस अंतिम समइया के याद आवेला।।
गरमी के दिनवा में.


ना जाने कहां से मुझे ये मिला था.. ना जाने किसका लिखा हुआ है.. अगर आप में से किसी को पता हो तो बताना ना भूलें.. आज जब मैं अपने जी-मेल के ड्राफ्ट को देख रहा था तो वहीं मैंने इसे देखा.. मुझे लगा कि आप लोगों को भी ये पढ़ना चाहिये.. सो यहां पोस्ट कर रहा हूं..